Friday, 31 July 2015


TRAIN KA HUMSAFAR


 टेन्ट हाउस वाले अपना टेन्ट निकल रहे थे | लॉन में कुर्सिय इधर उधर बिखरी पड़ी थी| ज़मीन पर पड़ा लाल कारपेट धुल मिट्टी से कुछ धुंधला हो गया था | प्लास्टिक के डिस्पोजेबल गिलास कटोरे जहाँ-तहाँ कारपेट पर गिरे पड़े थे | दिन भर की सगाई की चहल-पहल के बाद मेरा घर बिलकुल खामोश था | १५ दिन बाद मेरी और आदर्श की शादी थी | आदर्श ने दादाजी को इस बात के लिए भी मना लिया था के शादी हमारे इस पुराने घर से नहीं बल्कि उसके घर से होगी, याद शहर से | मैं एक नई दुनिया की देहलीज़ पे खड़ी थी जिसमे मेरे पास वो सब कुछ हो सकता था, जो लोग कहते थे के होना ज़रूरी है| और सब कुछ होने के बावजूद लग रहा था के किसी स्टेशन पे मेरा सामान छुट गया हो | दादाजी बहुत खुश थे| जिंदगी में पहली बार उनकी पोती को, ज्यादा अच्छे घरो के उनके रिश्तेदारों ने, इज्ज़त दी थी | दादाजी का रोम रोम मुझे आशीर्वाद दे रहा था | आते जाते मेरे सर पे हाथ फेर कर वो अपनी ख़ुशी जाता चुके थे |
सब रिश्तेदार जा चुके थे | चाचा चाची को कल सुबह जाना था | मैं उनका सामान पैक करने में उनकी मदद करने लगी | उनके कपडे, अटैची, और दूसरा सामान चारपाई पर बिखरा पड़ा था | थोड़ी देर बाद चाची हाथ में एक पैकेट लिए मेरे कमरे में आई-
“आदिती ये पैकेट भी अटैची में रख ले, कही इधर उधर हो जायेगा|” उन्होंने कहा |
मैंने पैकेट उनके हाथो से लिया और अटैची में रख लिया|

चाची चारपाई पे बैठ गई और प्यार में लपेट लपेट के ताने मरने लगी-
“इसे कहते है किस्मत | कहाँ तू , और कहा आदर्श | अब बड़े घर की बहु बन रही है तो भूल मत जाना के चाची ने कैसे मुसीबतों से पला है तुझको |”
मैं मुस्कुरा तक नहीं पाई | चाची ने अटैची को थोडा सरकाया और पास में आ कर बैठ गई| सर पर हाथ फेरते हुए बोली-
“शादी में सिर्फ १५ दिन ही रह गए है | बड़े घर के तौर तरीके सीख ले | बाद में हमको ताने न सुनना पड़े |”
मैं नज़ारे झुका कर उनकी बाते सुनती रही फिर कपड़े उठाने के बहाने वहाँ से उठ खड़ी हुई |

आधी रात बीत चुकी थी लेकिन नींद जैसे मुझसे रूठ के बैठ गई थी | जब करवटे बदालना भरी पड़ गया तो मैं उठ के बैठ गई | बहर तेज़ बारिश हो रही थी | बारिश की हर बूँद मेरे कानो से होते हुए सीधे मेरे दिल तक पहुँच रही थी| एक एक बूँद मेरी आत्मा पर गिरती महसूस हो रही थी |  मैंने कतरा-कतरा हिम्मत बटोरी और दादाजी के कमरे की तरफ चल दी | धीरे से उनका दरवाज़ा खटखटाया लेकिन बारिश में आवाज़ दब गई | मैंने दरवाज़े पे थप थोडा तेज़ कर दी | कुछ कुनमुनाने के बाद दादाजी उठे, दरवाज़ा खोला और मुझे देख कर थोडा चौके भी | मैं अन्दर जा के चारपाई पे बैठ गई| दादाजी मेरी बगल में आ कर बैठे और मेरे हाथो को अपनी हथेली  में भर लिया|
“दादाजी मेरा दम घुट रहा है ” मैं बोली, और आंसू रोकने के लिए अपनी आँखें भींच ली |
दादाजी ने धीरे से मेरा सर अपने कंधे पे टिका दिया |
“तुझको आदर्श पसंद नही है क्या आदी ?” दादाजी ने पूछा |
लेकिन दादा जी के सवाल का मेरे पास जवाब नहीं था| मैंने अपना सर दादाजी के कंधे पे और धसा लिया |
“ तुझको शादी नहीं करनी तो बता दे |  मैं सबको संभल लूँगा |’’ दादाजी ने मेरे बालों पे हाथ फिराते हुए कहा |
“पता नहीं दादाजी बस, घबराहट हो रही है ” मेरे मुहँ से किसी तरह निकला |
“पगली कही की | इसमें घबराने की क्या बात है ? शादी से पहले सभी को बेचैनी सी होती है| तू चिंता मत कर| “
दादाजी ने मुझको तसल्ली दे तो दी थी लेकिन मेरी घबराहट कम होने का नाम ही नहीं ले रही थी |  सिर्फ पंद्रह दिन थे मेरे पास, और फिर मेरी जिंदगी बदल जानी थी |

जून की तपती दोपहर थी | मैं स्टेशन की बेंच पे बैठी बार बार अपना पसीना पोंछ रही थी | दादाजी स्टेशन पर इधर उधर टहल रहे थे और बार बार ट्रेन के आने की दिशा की ओर देख रहे थे, जैसे उनके ऐसे करने से ट्रेन के आने की रफ़्तार बढ़ रही हो | मैंने उनके बाजू को पकड़ के उन्हें आशव्स्थ किया के वे घबराएँ नहीं | दादाजी इस बात से परेशान थे के मुझे अकेले ही याद शहर जाना पड़ रहा है| उनके टयूमर के ऑपरेशन की वजह से उन्हें कुछ दिन आराम करना था |
“ जब अपना काम पड़ता है तो सबको आदती याद आती है, आज सब आँख फेर के बैठ गए | कम से कम इस बार तो तुझको लेने के लिए किसी को भेज देते” | दादाजी बडबडा रहे थे, मुझको हंसी आ गई  | मैं कहना चाहती थी के आज तक सब अकेले ही किया है, ये सफ़र भी अकेले ही कर लुंगी | पर कुछ कहा नहीं |
 ट्रेन आई और दादाजी ने हडबडाते हुए मुझे ट्रेन में चढ़ा दिया | इस स्टेशन पे ट्रेन कुल मिला के बस एक मिनिट ही रूकती थी | मैं सीट पर बैठी और दादाजी खिड़की पे आ कर खड़े हो गए और बोले,
 “ तू घबरा मत आदी | मैं तेरी शादी से पहले ही पहुँच जाऊंगा |”
मैंने बेबसी से दादाजी की और देखा, आँखें थोडा भीग आई थी , तभी ट्रेन ने सिटी दी और ट्रेन चल पड़ी | “अपना ध्यान रखना “ दादाजी ने कहा, फिर उनकी आवाज़ कही पीछे छुट गई |
 अकेले सफ़र करने का ये मेरा एकलौता मौका नहीं था |  चाचियो माँमियो के बुलावे पे मुझे उनके घर जाना ही पड़ता था | किसी के घर शादी में हाथ बटाना है, तो किसी के घर बच्चो को संभालना है, या कोई महीने दो महीने के लिए माइके जा रही है |
 और किसी मौके पे याद आये न आये , बिन माँ बाप की अकेली-जान बेटी की ऐसे मौको पे रिश्तेदारों को याद आ ही जाती थी |
 मगर इस बार उनकी ज़रूरत नहीं थी, इस बार ये एक एहसान था जो बिन मर्ज़ी के मेरे ऊपर थोपा जा रहा था | बिन माँ बाप की बेटी के लिए चाची ने एक लड़का ढूँढ रक्खा था, मेरी हैसियत से कही ज्यादा |
 ट्रेन में बैठते ही मेरी धड़कन भी ट्रेन की रफ़्तार से दौड़ रही थी | मैंने अपने बैग को अपनी गोद में रखा और हथेलिओ को भींच लिया |  मुझे लग रहा था के मैं चलती ट्रेन से कूद पडू और भाग के दादाजी के पास चली जाऊं  | सगाई के दौरान चाची ने मुझको सिर्फ एक हफ्ते के लिए दादाजी के घर रहने की इजाजाद दी थी | माँ पापा के बाद मैं चाची के घर पे एक कैदी की तरह रह रही थी | कॉलेज छुड़ा दिया गया, दोस्त छुट गए, और मेरे होने वाले पति में मुझे चाची का ही चेहरा नज़र आ रहा था | आदर्श की कही बात बार बार मेरे कानो में हथोड़े की तरह बजती रहती – “ मैंने माँ से पहले ही कह दिया था के मेरे लिए बिलकुल सीधी साधी लड़की ढूंढे , बिलकुल तुम्हारी तरह | अच्छा हुआ तुम्हारी पढाई छुट गई | पढ़ लिख के लडकिय उड़ने लगती है|” क्या बताती आदर्श को, के मैं भी उड़ना चाहती हूँ |
ट्रेन शहरो को पीछे छोडती भागे जा रही थी | धीरे धीरे मैं आदर्श को भूलने लगी |  ये सफ़र मुझे अच्छा लगने लगा | बाहर एक नई दुनिया थी, रंग बिरंगी, आज़ादी से भरी हुई | आसमान अचानक बादलो से घिर आया था और फिर बादल बरसने लगे | मैंने अपना हाथ ट्रेन की खिड़की से बहार निकला और हथेली में बारिश की बूंदे जमा करने लगी , जैस ये बूंदे सिर्फ मेरे लिए ही बरस रही थी | दूर एक मैदान में बच्चे फुटबॉल खेल रहे थे | बच्चो को देख कर मेरे चेहरे पे मुस्कान आ गई | मैं बहुत देर से इस बारिश को, इस मौसम को अपनी आँखों में समेट रही थी | कभी ट्रेन से टकरा कर आई पानी की धार को हाथो से तितर-बितर करने लगती, तो कभी खिड़की के खानो में जमा हुए पानी को उंगलियों से ठेलने लगती  | मैं इस बात से अनजान थी के पड़ोस से एक अजनबी की दो जोड़ी निगाहें मुझे घूर रही थी|
“लगता है बारिश बहुत पसंद है आपको” अचानक एक आवाज़ सुन के मैं चौकी |
 मेरी बगल की सीट पे बैठा वो लड़का जाने कब से मुझको देख के मुस्कुराये जा रहा था | मैंने कंधे से थोडा खिसक आया दुपट्टा थोडा ठीक किया और खिड़की की तरफ थोडा सिमट आई | बारिश अब भी लगातार हो रही थी मगर मैं फिर से उस दुनिया में जाने की हिम्मत नही जुटा पा रही थी, खास तौर पर ये जानने के बाद के मेरे पड़ोस में बैठे शख्स की आँखे लगातार मेरा पीछा कर रही थी | मेरे अन्दर एक सिहरन सी मच गई | मैंने पहली बार बोगी में बैठे लोगो पे नज़र दौड़ाई | कोने वाली सीट पे बच्चे को गोद में लिए एक औरत को बैठा देख के थोड़ी तसल्ली हुई, पर दिल से डर नहीं निकला |
“कभी बारिश की आवाज़ सुनी है आपने  ?” वो लड़का फिर बोला |
मैंने झेपते हुए उसकी और देखा |
  “सुनी है बारिश की आवाज़ ?” फिर से बोल कर उसने आँखें बंद कर ली |
“ आँखे बंद करके सुनो तो हर बूँद सीधे आत्मा को भिगोती हुई लगती है | फिर सारा डर ख़तम हो जाता है |” उसने आँखे बंद किये किये कहा |फिर जैसे वो बारिश में खो गया |
पहली बार मैंने गौर किया के उसकी बाएँ आँख के ऊपर छोट का निशान है , और उसके होठो पे तिल, ठीक उसी जगह पर मुझे भी तिल था |  मेरा हाथ अपने तिल पर चला गया |
“ टिकेट...”  अचानक मैं झेप उठी , मैंने बैग से अपना टिकेट निकल कर टी टी को दिखा दिया |
“भाई साहब टिकेट ’’ टी.टी  अब उसके कंधे हिला रहा था | उसका ध्यान टूटा और उसने हडबडाहट में अपना बैग टटोला, लेकिन शायद उसे टिकेट मिला नहीं | फिर उसने पूरा का पूरा बैग सीट पे उलट दिया | छोटे छोटे शंख, सीपियाँ , छोटी छोटी कठपुतलियाँ , कांच की , लकड़ी की, बांस की बनी छोटी छोटी चीज़े , न जाने क्या क्या भरा पड़ा था उसके बैग में , इन्हें सामान के बीच उपेक्षित सा पड़ा टिकेट आखिर मिल ही गया |
“ शिखर श्रीवास्तव ? ” टी.टी टिकेट चेक कर के चला गया और शिखर अपना सामान फिर से समेटने लगा | बैग खाली करते समय उसका कुछ सामान इधर उधर बिखर गया था |
“ये कड़ा पास कर देगी ज़रा ?”
उसने कड़े की और इशारा किया जो लुढ़क के मेरे बैग के पास आ गया था|  मैंने कडा उठाया | लाख के उस कड़े पे रंगबिरंगी चमकिली दुनिया उकेरी हुई थी |  इतना सुन्दर कडा मैंने छूना तो दूर, आज तक देखा भी नहीं था | मैं कुछ पल उसे देखती रही फिर उसकी और बढ़ा दिया |
 “ चाहे तो आप इसे रख लीजिये, जो चीज़ पसंद आये उसे छोड़ना नहीं चाहिए ” उसने कहा |
“लेकिन दूसरे की चीज़ रखनी भी नहीं चाहिए “ पूरे सफ़र में मैं पहली बार कुछ बोली थी |
“ अरे आप हिंदी समझती और बोलती भी है , मुझे तो लगा....’’ उसकी बात अभी पूरी भी नहीं हुई थी और वो दूसरी और मुड़ गया |
बगल की सीट पे बैठी औरत की गोद में बैठा बच्चा शिखर का बैग खीच के रोने लगा था | शायद उसने भी उस बैग में अपने काम की कुछ चीज़ देख ली थी | शिखर ने उसके गालो को प्यार से खीचा और अपने बैग से एक छोटी सी कठपुतलि निकल कर उसके हाथ में थमाँ दी | बच्चा कभी हाथो से तो कभी दांतों से कठपुतलि को खीचने लगा | अब से कुछ देर पहले आँखों को बंद कर के बारिश को महसूस करने वाला वो शख्स अब उस बच्चे के साथ खेलने में व्यस्त था | मैं तिरछी नज़र से उसे देखती और फिर अपनी इस हरकत के लिए खुद को कोसती फिर अगले ही पल उसे देखने लगती | और एक बार मेरी चोरी पकड़ी गयी| मैं उसे देख रही थी और ठीक उसी वक़्त उसकी नज़ारे उठी | वो मुस्कुराया और मैंने अपनी नज़ारे झट से फेर ली थी | मैं उस मुस्कराहट में जैसे बांध गयी थी मेरी नज़ारे तो उससे हट गई लेकिन दिल शायद उसी मुस्कान में अटका रह गया |
सफ़र लम्बा था और रात हो गई थी | मैं ऊपर की बर्थ पे जा कर बैठ गई थी | सोने से पहले अपनी डायरी निकली | डायरी पे चढ़ी अखबार की जिल्द पुरानी हो गई थी | कई बार सोचा था के जिल्द बदल दूँ , फिर सोचा के जिल्द बदल भी दूँ तो कौन सा जिंदगी बदल जानी हैं |  आज भी ऐसा ही लगा था पर मैंने डायरी खोल ही ली थी | एक और सपना मैंने डायरी के पन्नो पे उतार दिया | मेरे सिवा बस एक ये डायरी थी जो मुझको समझती थी |
मुझको दुनिया घूमनी थी |
मुझको चांदनी रातो में समुद्र के किनारे टहलना था |
मुझको बर्फिले पहाड़ो की चढ़ाई करनी थी |
मुझको घने जंगलो में तम्बू लगा के रात बितानी थी |
मुझको समुद्र की गहराई में जा कर मछलियों से मिलना था |
मुझको चाँद पे जाना था, मुझको तारो से बाते करनी थी....
पर ये सब किससे कहती ?
बुज़ुर्ग, कमज़ोर , मेरे लिए हमेशा परेशान रहने वाले दादा जी से ?
वो सुन ज़रूर लेते | मेरे बचकाने सपनों पे मुस्कुरा भी देते पर कुछ कर नहीं सकते थे|  चाचा, मामा , मौसी , इनके लिए मैं एक बोझ बन गई थी | चाची ने इस बोझ को उतरने का रास्ता निकल लिया था | मेरा दिल भर आया था | फिर डायरी नहीं लिखी जा सकी , मैंने पेन को पन्नो के बीच में खोंस कर लेट गई|

वो लड़का , याने शिखर, नीचे वाली बर्थ पे बैठे एक नक़्शे पर पेन से निशान लगा रहा था | फिर कुछ हिसाब लगता और कही और निशान लगाने लगता | मैं थोड़ी देर उसे देखती रही,  फिर ट्रेन के धच्कोलो के बीच मुझे भी नींद आ गई |
सुबह जब आँख खुली तो ट्रेन बड़ोदा पहुँच चुकी थी | मैं नीच उतरी और मुंह धोने चली गई | वापस लौटते समय मैं ऊपर जाने की बजाये  नीचे ही बैठ गई | सुबह की ताज़ी-ताज़ी हवा बहुत ही अच्छी लग रही थी |
“गुड मोर्निंग..... ये  लीजिये चाय’’ शिखर ने प्लास्टिक वाला कप मेरी और बढ़ाया |
इस वक़्त मुझे चाय की सख्त ज़रूरत थी मगर थोडा संकोच हो रहा था |
“चिंता मत कीजिये, मेरे पास एक और चाय है “ शिखर ने मुस्कुरा के कहा और दुसरे कप से चाय पीने लगा |
मैंने कप ले लिया | अब वो उतना अनजान नहीं रह गया था | अब तो उससे डर बिलकुल भी नहीं लग रहा था मुझको |
“तो आप याद शहर जा रही है?” शिखर ने चाय का घूंट ले कर पूछा |
मैं चौकी ! मेरे कप से झलक के चाय की कुछ बूँद मेरे सूट पर  गिर गई |
उसने नए अखबार  की जिल्द वाली एक कॉपी मेरी और बढ़ा दी |
“ अपने सपनों को अच्छे से संभल के रखिये, मिस गुमसुम , आई मीन मिस आदिति “
मैंने उस कॉपी को देखा और घबरा कर अपने बैग को टटोला | मेरी कॉपी वह नहीं थी |
करीब-करीब झपटते हुए मैंने उसके हाथो से मेरी डायरी ली |
रात को आपके बैग से गिर के मेरी सीट पे आ गई थी | जिल्द फट गई थी तो मैंने बदल दी | मेरी घबराहट देख के वो थोडा सकपका गया था |
मैंने डायरी अपने बैग में रखी और बैग को कसके अपनी गोद में दबा लिया | पूरी बोगी खामोश थी | सिर्फ रेल की धड-धड आवाज़ आ रही थी | इस ख़ामोशी को शिखर की  आवाज़ ने ही तोड़ा |
 “इफ्फ यू डोंट माइंड एक बात कहूँ ?
 हम सबके पास सिर्फ एक ज़िन्दगी है |
डायरी में लिख के कुछ नहीं होगा | जो करना है इसी जिंदगी में करना है" शिखर ने कहा और मैं उसे देखते रह गई |
तेरह घंटे से एक साथ रहते हुए इतना तो मैं जान गई थी के चुप रहना शिखर की आदत नहीं है | लेकिन काफी देर से वो चुप था , उसने मेरी डायरी चुपके से पढ़ ली थी | वो डायरी जो मैंने दादाजी तक से छुपा के रखी थी | लेकिन जाने क्यों मुझे उसपे गुस्सा नहीं आ रहा था | जाने क्यों मैं अपने सपने उससे बाँटना चाहती थी | पहली बार ऐसा कोई मिला था जिससे खुल के बात करने को दिल चाह रहा था |
“आप भी याद शहर जा रहे है ?” पहली बार मैंने अपनी तरफ से कुछ पूछा था |
“पता नहीं | निकला तो याद शहर के लिए ही था, लेकिन अब सोच रहा हूँ के इंदौर में ही उतर जाऊं | सुना हैं इंदौर के पास एक झरना है, पातालपानी | अब झरना तो देखना बनता है | फिर वहां से ट्रैकिंग पे जाऊगा फिर कल यही से याद शहर के लिए ट्रेन पकड़ लूँगा” उसने बेपरवाही से कहा |
“और कल अगर ट्रेन नहीं मिली तो ?’’ मैं जैसे उसको नहीं खुद को ही जोखिम लेने से रोक रही थी |
“तो परसों मिल जायेगी | अगर जिंदगी में क्या होने वाला है ये पहले से ही पता चल जाए तो जिंदगी विडियो गेम नहीं बन जाएगी ?’’ उसने कहा |
मैं उसकी बातो में बही जा रही थी |
 क्या जिंदगी है इस लड़के की | जब मन करे, जहाँ मन करे चले गए | किसी का डर नहीं | बिलकुल वैसी जिंदगी जैसी मैं अपने सपने में देखती थी |
“आप हमेशा ऐसे रहते है?”
‘’आपके घरवाले नाराज़ नहीं होते है?” मैंने पूछा |
“आप तो हमेशा वही  करती हैं न जो आपके घरवाले कहते है? तो क्या आपके घरवाले आपसे खुश है ?
खुद को खुश रखने की पहली ज़िम्मेदार मेरी है, मैं तो यही मानता हूँ |’’
हमे बात करते करते २-३ घंटे हो गए थे | इन् घंटो में मैं कितनी अनदेखी दुनिया उसकी नज़रो से देख रही थी |
 नैनीताल की वादियों में बदलो को अपने हाथो से छूने का एहसास ,
 असम में  आदिवासी परिवारों के साथ गुज़ारे दिन,
 केरल के तट पे पैरो पे गिरते समुद्र के थपेड़े,
 चेरेल में बकरिया चराने की कहानिया |
ऐसा लग रहा था के शिखर ऐसे ही कहानिया सुनते जाए और जिंदगी ख़तम हो जाए |
मैं फिर से उसी बेपरवाह बचपन में पहुँच गई थी| बचपन में मुझे घुमने फिरने का, जिंदगी को खुल के जीने का बहुत शौक था | 9th क्लास में कॉलेज टूर पर हमे कर्नाटक जाना था | टूर के नाम पे तो  माँ पैसे नहीं देती, इसलिए मैंने सिलाई की क्लास के नाम से पैसे लिए और बिना बतये उनके नाम पे चिट्ठी छोड़ के एक हफ्ते के लिए कर्नाटक चली गई | वापस आ के पिटाई तो हुई लेकिन कर्नाटक में बिताये वो दिन आज भी चेहरे पर मुस्कान ला देते है |
“ कितना बुलवा रही हो मुझसे तुम ? एक तो तुम्हारी डायरी के चक्कर में मैं रात भर सो नहीं पाया और अब भी मुझे सोने नहीं दे रही हो |” शिखर शरारत से मुस्कुराते हुए बोला और सीट पर लेट कर चेहरे पर चादर ओढ़ ली | फिर चेहरे से चादर हटा कर बोला, “मिस अदिति , इंदौर आ जाए तो जगा दीजियेगा  |”
सिर्फ ४-५ घंटे बाद शिखर को जाना था | न जाने क्यों इस बात को सोच कर ही मेरा दिल भर आ गया |
चार घंटे में गाड़ी इंदौर पहुँच गई | शिखर को अब जाना था | मेरा दिल कह रहा था के इंदौर कभी आये ही नहीं...!
काश ये ट्रेन कभी रुके ही नहीं, काश......काश शिखर जाए ही नहीं....!!!
काश.........!
लेकिन धीमी होती-होती ट्रेन आखिर रुक ही गई | मैंने भरी हुई आँखों से शिखर की तरफ देखा | वो बैग को तकिया बनाये बच्चो की तरह सो रहा था|  मैंने धीरे से उसके बालो को छू लिया|  उसको ऐसा मासूमियत से सोया देख जगाने का मन नहीं हुआ | लेकिन जगाना जारूरी था | मैंने हलके से उसके कंधे को हिलाया | वो हडबडा के उठा और जल्दी जल्दी जूते पहनने लगा | इंदौर स्टेशन पे गाडी १५ मिनिटे रुकती थी | शिखर ने अपना सामन समेट लिया था लेकिन वो उतरा नहीं , वंही बैठ गया| 
“मेरा स्टेशन तो आ गया| सच कहूँ तो जाने का मन नहीं कर रहा | उसने ज़माने भर की मुस्कराहट लुटते हुए कहा |
मैं कहना चाहती थी- “ मत जाओ शिखर, मेरे पास ही रुक जाओ.....|” लेकिन किस हक़ से कहती?
एक अनजान आदमी के लिए इतना लगाव...?
मेरा दिमाग मुझे जता रहा था.... ये पागलपन हैं....|
मेरी शादी को सिर्फ एक हफ्ता बचा था | मेरे चेहरे पर एक बुझी हुई सी मुस्कान उभरी |
“अनजान लोगो से दोस्ती का क्या फायदा ?” मैंने कहा |
“ दोस्ती फायदा देख के ही होती तो वो दोस्ती भी नहीं होती... | इसके बाद शायद हम कभी मिले ही नहीं, लेकिन सोचो अगर इत्तेफाक से हम कही मिल गए तो कितनी ख़ुशी होगी...| और अगर ना भी मिले तो एक दूसरे को याद करके मुस्कुरा तो पायेगे |”
उसकी इस बात से मैं इस बार सच में मुस्कुराई |
कुछ घंटे पहले मैं खुद से हार मान के इस ट्रेन में बैठी थी , लेकिन मैं अब कुछ और ही हो गई थी |
मैं फैसला कर चुकी थी के मैं आदर्श से शादी नहीं करुगी |
मैं फैसला कर चुकी थी मैं अपने फैसले करने का हक़ चाची या किसी और को नहीं दुगी|
मैं तय कर चुकी थी के मैं अपनी इस एक मात्र जिंदगी को अपनी शर्तो पे जिऊगी |
जिसने मुझको ये सब करने की हिम्मत दी थी मैं उसको धन्यवाद का एक शब्द कहने की हिम्मत नहीं जुटा पा रही थी |
शिखर ने अपना बैग उठाया और खड़ा हो गया | जाते जाते वो रुक गया और झुक के उसने मेरा दाया हाथ पकड़ लिया, और लाख का वाही नक्काशी वाला कड़ा मेरी कलाई में सरका दिया |
तभी ट्रेन ने सिटी दी और शिखर बिना मुड़े ट्रेन से उतर गया| मैं खिड़की से उसे जाता देखती रही |
एक आखरी बार उसका चेहरा देखने की उम्मीद कर रही थी|
ट्रेन आगे सरकने लगी थी, लेकिन उसने मुड कर नही देखा...
थोड़ी देर में वो स्टेशन की भीड़ में कही खो गया.....
मेरी आँखों से लुढ़कते हुए आंसू मेरे गालो से होते हुए मेरी गर्दन तक पहुँच गए थे|
मैं अपनी कलाई में पड़े उस कड़े को देखती रही, फिर उसे अपने होंठो से छू लिया |
बस १५-१६ घंटे की मुलाकात थी हमारी | बस इन् थोड़े से घंटो में मेरी जिंदगी में उथल पुथल मचा के चला गया था शिखर, फिर कभी न मिलने के लिए...|
शिखर की बाते अब भी मेरे कान में गूंज रही थी |
मैंने शिखर के कहे आखरी शब्द अपनी डायरी के आखरी पन्ने पर उसके नाम के साथ लिख दिए-
“सोचो अगर इत्तेफाक से हम कही मिल गए तो कितनी ख़ुशी होगी.......
और अगर ना भी मिले तो एक दुसरे को याद कर के मुस्कुरा तो पायेगे |” मैं शिखर को याद करके मुस्कुरा दी |
और मैं डायरी बंद ही कर रही थी के अचानक आखरी पन्ने पर लिखी अनजान लिखावट पर नज़र पड़ गई |
लिखा था-


“ ये सफ़र तो ख़तम हो रहा है लेकिन मेरा दिल कह रहा है-
 हमारा साथ लम्बा चलेगा ....
 १५ नवम्बर को उटी बेस कैंप से निलगिरी हिल्स पे ट्रैकिंग करने जा रहा हूँ |
 एक साथी का इंतज़ार रहेगा.........!
शिखर....






बस||||इतनी सी थी ये कहानी|||||



                                                                                           



                                                                                      









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